मोतीचूर के लड्डू, और पद्मावत की प्रति खिंच ले आती है पर्यटकों को मनेर

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मनेर शरीफ की दरगाह ऐसे तो मुस्लिम समुदाय के लिए धार्मिक महत्त्व रखता है, लेकिन अपनी खूबसूरती और ऐतिहासिक महत्ता की वजह से सभी समुदाय के लोगों के लिए एक पर्यटन स्थल भी है। और पर्यटन स्थल के साथ ही मनेर अपने लड्डुओं के लिए भी प्रसिद्ध है।

इसके अलावा पटना से करीब से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मनेर के लड्डू सिर्फ भारत और बिहार नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर हैं। मनेर का लड्डू अपनी स्वाद, मिठास और देशी घी के सुगंध के कारण सभी मिठाइयों में अपनी खास और अलग पहचान बनाता है। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग यहां से लड्डू खरीदकर दूसरे देशों में सौगात के रूप में भेजते हैं। आमिर खान जैसे अभिनेता भी मनेर के लड्डू के स्वाद का लुफ्त उठा चुके हैं। मनेर के लड्डू के लिए जीआई टैग की भी कोशिश की जा रही है।

मनेर के लड्डू के इतिहास की बात करें तो यहां के स्थानीय बताते हैं कि पहली बार मुगल बादशाह शाह आलम इमली के पत्ते के दोने में अपने साथ ‘नुक्ति के लड्डू’ लेकर दिल्ली से मनेर आए थे। यहां के ख़ानक़ाह के गद्दीनशीं संत और अन्य लोगों को यह लड्डू बेहद पसंद आया जिसके बाद बादशाह शाह आलम दिल्ली के कारीगर साथ फिर से मनेर आए।

इन कारीगरों ने स्थानीय लोगों को लड्डू बनाने का तरीका सिखाया और धीरे-धीरे यहां के कारीगर इतने निपुण हो गए कि बाद में यह लड्डू ‘मनेर के लड्डू’ के नाम से विश्व विख्यात हो गया। लगभग सौ साल पुरानी दुकान मनेर स्वीट्स के मालिक बताते हैं कि अंग्रेजों ने इस लड्डू का स्वाद चखकर इसे वर्ल्ड फेम लड्डू का प्रमाण पत्र दिया था।आज भी इस लड्डू को खाने वाले जमकर तारीफ करते हैं। दूर-दूर से लोग इस स्वदिष्ट लड्डू का स्वाद लेने मनेर आते हैं। इस लड्डू से सिर्फ मनेर ही नहीं पूरे बिहार की पहचान उभरकर सामने आती है।

व्याकरणशास्त्री पाणिनी और वररुचि, सूफी संत मखदूम याह्या मनेरी और मखदूम दौलत की धरती मनेर में काव्य पद्मावत की एक हस्तलिखित प्रति मौजूद है। इस खानकाह के कर्ताधर्ता बताते हैं कि यह प्रति जायसी ने खुद तैयार की थी। पद्मावत फिल्म की पॉपुलारिटी से इस जगह पर पर्यटकों की भीड़ बढ़ गई।

यहां पद्मावत के अलावा मुल्ला दाउद की रचना चंदायन की प्रति भी है। चंदायन की सूफी साहित्य की पहली कृति माना जाता है, यहां तक कि कई लोग इसे हिंदी की पहली किताब भी कहते हैं। उसकी स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। हालांकि इतिहासकार खानकाह के इस दावे से सहमत नहीं हैं कि यहां मौजूद पद्मावत जायसी द्वारा हस्तलिखित है। इसलिए इसके संरक्षण के लिए कोई खास कोशिश नहीं की गयी है।

पटना के पास स्थित मनेर कई वजहों से प्रसिद्ध है। वैसे तो यह सूफी संतों मखदूम याह्या मनेरी और मखदूम दौलत की मजारों के कारण दुनिया भर में जाना जाता है. माना जाता है कि मनेर शरीफ़ स्थान पर ही सूफ़ी संत मखदूम दौलत ने वर्ष 1608 में अंतिम साँस ली थी।

इसके अलावा यह व्याकरणाचार्य पाणिनी और वररुचि की धरती है। कुल मिलाकर इसकी पहचान ज्ञान की भूमि के रूप में है। आप भी जब बिहार आएं तो मनेरशरीफ जरूर घूमें और मनेर के लड्डुओं का स्वाद लेना।

 

 

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