ख़ूबसूरत संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को समेटे है मिथिलांचल

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मधुबनी का नाम लेते ही सुंदर मधुबनी चित्रकला की तस्वीर जेहन में कौंधने लगती है। मधुबनी भारत के बिहार प्रान्त में दरभंगा प्रमंडल अंतर्गत एक प्रमुख शहर एवं जिला है। दरभंगा एवं मधुबनी को मिथिला संस्कृति का द्विध्रुव माना जाता है। मैथिली तथा हिंदी यहाँ की प्रमुख भाषा है। विश्वप्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग एवं मखाना के पैदावार की वजह से मधुबनी को विश्वभर में जाना जाता है। इस जिला का गठन 1972 में दरभंगा जिले के विभाजन के उपरांत हुआ था। मधुबनी के प्रमुख पर्यटन स्थलों में जयनगर, सौराठ, कपिलेश्वरनाथ, भवानीपुर, झंझरपुर और फुल्लाहर शामिल है।

राजनगर

राजनगर मधुबनी जिले का एक एतिहासिक महत्व जगह है। यह एक जमाने में महाराज दरभंगा की उप-राजधानी हुआ करता था। यह मराराजा रामेश्वर सिंह के द्वारा बसाया गया था। उन्होंने यहां एक भव्य नौलखा महल का निर्माण करवाया लेकिन 1934 के भूकंप में उस महल को काफी क्षति पहुंची और अभी भी यह भग्नावशेष के रूप में ही है।

इस महल में एक प्रसिद्ध और जाग्रत देवी काली का मंदिर है जिसके बारे में इलाके के लोगों में काफी मान्यता और श्रद्धा है। जब इस नगर को रामेश्वर सिंह बसा रहे थे उस वक्त वे महाराजा नहीं, बल्कि परगने के मालिक थे। राजा के छोटे भाई और संबंधियों को परगना दे दिया जाता था जिसके मालिक को बाबूसाहब कहा जाता था। बाद में अपने भाई महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की मृत्यु के बाद, रामेश्वर सिंह, दरभंगा की गद्दी पर बैठे।

लेकिन 1934 के भूकंप ने राजनगर के गौरव को ध्वस्त कर दिया। हलांकि यहां का भग्नावशेष अवस्था में मौजूद राजमहल और परिसर अभी भी देखने लायक है। राजनगर, मधुबनी जिला मुख्यालय स करीब 7 किलोमीटर उत्तर में है और मधुबनी-जयनगर रेलवे लाईन यहां से होकर गुजरती है। यह मधुबनी-लौकहा रोड पर ही स्थिति है और यातायात के साधनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

यहां प्रखंड मुख्यालय, कॉलेज, हाईस्कूल, पुलिस स्टेशन, सिनेमा हॉल आदि है। एक जमाने में नदी कमला इसके पूरव से होकर बहती थी। अब उसने अपनी धारा करीब 7 किलोमीटर पूरव खिसका ली है और भटगामा-पिपराघाट से होकर बहती है। राजनगर से उत्तर खजौली, दक्षिण मधुबनी, पूरव बाबूबरही और पश्चिम रहिका ब्लाक है। यहां से बलिराजगढ़ की दूरी 20 किलोमीटर है, जो मौर्यकाल से भी पुराना ऐतिहासिक किला माना जाता है।

सौराठ

मधुबनी-जयनगर रोड पर स्थित इस गाँव में सोमनाथ महादेव मंदिर का मंदिर है। यहाँ मैथिल ब्राह्मणों की प्रतिवर्ष होनेवाली सभा में विवाह तय किए जाते हैं। इस गाँव में तथा अन्यत्र रहने वाले पंजीकार इस क्षेत्र के ब्राह्मणों की वंशावली रखते हैं और विवाह तय करने में इनकी अहम भूमिका होती है।

 

कपिलेश्वरनाथ

मधुबनी से 9 किलोमीटर दूर इस स्थान पर अति पूज्य कपिलेश्वर शिव मंदिर है। प्रत्येक सोमवार तथा सावन के महीने में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है। महाशिवरात्रि को यहाँ मेला भी लगता है।

 

बाबा मुक्तेश्वरनाथ स्थान

भगवान शिव को समर्पित श्री श्री 108 बाबा मुक्तेश्वरनाथ (मुक्तेश्वर स्थान) शिव मंदिर एक हिन्दू धर्म – स्थल है जो बिहार राज्य के मधुबनी जिला अन्तर्गत्त अंधराठाढ़ी प्रखंड के देवहार ग्राम में स्थित है।

उचैठा

बेनीपट्टी प्रखंड में थुमने नदी के पश्चिमी किनारे पर देवी भगवती का मंदिर है। जनश्रुतियों के अनुसार यहाँ संस्कृत कवि एवं विद्वान कालीदास को देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।

भवानीपुर

पंडौल प्रखंड मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव में उग्रनाथ महादेव (उगना) शिव मंदिर है। बिस्फी में जन्में मैथिली के महान कवि विद्यापति से यह मंदिर जुड़ा है। मान्यताओं के अनुसार विद्यापति शिव के इतने अनन्य भक्त थे कि स्वयं शिव ने ही उगना बनकर उनकी सेवा करने लगे।

कोइलख

कोइलख एक प्रमुख गाँव है जो माँ काली के लिए प्रसिद्ध है यहाँ जो मनोकामना मांगी जाती है वो जरुर पूरी होती है .

 

बलिराज गढ़

यहां प्रचीन किला का एक भग्नावशेष है जो करीब 365 बीघे में फैला हुआ है। यह स्थान जिला मुख्यालय से करीब 34 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में मधुबनी-लौकहा सड़के के किनारे स्थित है। यह नजदीकी गांव खोजपुर से सड़क मार्ग से जुड़ा है जहां से इसकी दूरी 1.5 किलोमीटर के करीब है। इसके उत्तर में खोजपुर, दक्षिण में बगौल, पूरब में फुलबरिया और पश्चिम में रमणीपट्टी गांव है। इस किले की दीवार काफी मोटी है और ऐसा लगता है कि इसपर से होकर कई रथ आसानी से गुजर जाते होंगे।

यह स्थान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है और यहां उसके कुछ कर्मचारी इसकी देखभाल करते हैं। पुरातत्व विभाग ने दो बार इसकी संक्षिप्त खुदाई की है और इसकी खुदाई करवाने में मधुबनी के पूर्व सीपीआई सांसद भोगेंद्र झा और स्थानीय कुदाल सेना के संयोजक सीताराम झा का नाम अहम है। यहां सलाना रामनवमी के अवसर पर चैती दुर्गा का भव्य आयोजन होता है जिसमें भारी भीड़ उमड़ती है। इसकी खुदाई में मौर्यकालीन सिक्के, मृदभांड और कई वस्तुएं बरामद हुई हैं।

लेकिन पूरी खुदाई न हो सकने के कारण इसमें इतिहास का वहुमूल्य खजाना और ऐतिहासिक धरोहर छुपी हुई है। कई लोगों का मानना है कि बलिराज गढ़ मिथिला की प्राचीन राजधानी भी हो सकती है क्योंकि वर्तमान जनकपुर के बारे में कोई लोगों को इसलिए संदेह है क्योंकि वहां की इमारते काफी नई हैं। दूसरी बात ये कि रामायण अन्य विदेशी यात्रियों के विवरण से संकेत मिलता है कि मिथिला की प्राचीन राजधानी होने के पर बलिराजगढ़ का दावा काफी मजबूत है। इसके बगल से दरभंगा-लौकहा रेल लाईन भी गुजरती है और नजदीकी रेलवे हाल्ट बहहड़ा यहां से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर है।

इसके अगल-बगल के गांव भी ऐतिहासिक नाम लिए हुए हैं। रमणीपट्टी के बारे में लोगों की मान्यता है कि यहां राजा का रनिवास रहा होगा। फुलबरिया, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है फूलो का बाग रहा होगा। बगौल भी बिगुल से बना है जबकि कुछ ही दूरी पर नवनगर नामका गांव है। जो गरही गाँव इसके नजदीक में है। बलिराज गढ़ में हाल तक करीब 50 साल पहले तक घना जंगल हुआ करता था और पुराने स्थानीय लोग अभी भी इसे वन कहते हैं जहां पहले कभी खूंखार जानवर विचरते थे।

वहां एक संत भी रहते थे जिनके शिष्य से धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने दीक्षा ली थी। कुल मिलाकर, बलिराजगढ़ अभी भी एक व्यापक खुदाई का इंतजार कर रहा है और इतिहास की कई सच्चाईयों को दुनिया के सामने खोलने के लिए बेकरार है। इस के नजदीक एक उच्च विद्यालय नवनगर में है जो इस दश किलो मिटर के अन्तर्गत एक उच्च विद्यालय है जो नवनगर में शिक्षा के लिए जाना जाता है।

मधुबनी

मधुबनी पहले दरभंगा जिला का ही हिस्सा था और 1972 में इसे स्वतंत्र जिले का दर्जा प्राप्त हुआ था। यहां साहित्य से जुड़ी कई हस्तियां पैदा हुई हैं। वास्तव में ऐसा समझा जाता है कि मधुबनी लोकतंत्र को अपनाने वाला दूसरा शहर था। मधुबनी शब्द की उत्पत्ति मधु और वाणी से हुई है। मधु का अर्थ होता है मीठा या मधुर और वाणी का अर्थ होता है स्वर या बोली। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि यहां के लोगों की बोली काफी मधुर और मीठी होती है।

मैथिली यहां बोली जाने वाली मुख्य भाषा है, वहीं हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भी यहां के लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। यह स्थान समुद्र तल से 56 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यहां मंदिर और तीर्थस्थल के रूप में ढेरों पुरातात्त्विक और धार्मिक स्थल हैं। यहां पूरे साल बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। मधुबनी के पुरातत्व में आप मध्ययुगीन काल के आरंभ की निशानियां देख सकते हैं। अगर खानपान में आपकी दिलचस्पी है तो स्वीट वाटर फिश और मखाना इस जगह की खासियत है। छठ यहां मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है।

मधुबनी की समृद्ध संस्कृति

मैथिली हस्तशिल्प में कताई और बुनवट का अहम स्थान है और यह पूरे देश में प्रसिद्ध है। भले इन हस्तशिल्प को महिलाएं बनाती हों, पर ये इस क्षेत्र के समृद्ध हेंडलूम टेक्सटाइल का बेहतरीन उदाहरण है। इसके अलावा विभिन्न प्रकार की पुरातात्त्विक संपदा मधुबनी पर्यटन को और भी समृद्ध बना देती है। यह शहर मधुबनी पेंटिंग के लिए भी जाना जाता है। इसे पेड़-पौधों के रंग और दिये की कालिख से बनाया जाता है। केनवास के तौर पर पेपर के साथ-साथ कपड़ों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इस क्षेत्र में मधुबनी लोकगीत भी काफी लोकप्रिय है।

मधुबनी मिथिला संस्कृति का अंग एवं केंद्र विंदु रहा है। राजा जनक और सीता का वास स्थल होने से हिंदुओं के लिए यह क्षेत्र अति पवित्र एवं महत्वपूर्ण है। मिथिला पेंटिंग के अलावे मैथिली और संस्कृत के विद्वानों ने इसे दुनिया भर में खास पहचान दी है। प्रसिद्ध लोककलाओं में सुजनी (कपडे की कई तहों पर रंगीन धागों से डिजाईन बनाना), सिक्की-मौनी (खर एवं घास से बनाई गई कलात्मक डिजाईन वाली उपयोगी वस्तु) तथा लकड़ी पर नक्काशी का काम शामिल है।

सामा चकेवा एवं झिझिया मधुबनी का लोक नृत्य है। मैथिली, हिंदी तथा उर्दू यहाँ की मुख्‍य भाषा है। यह जिला महाकवि कालीदास, मैथिली कवि विद्यापति तथा वाचस्पति जैसे विद्वानों की जन्मभूमि रही है।

मधुबनी पेंटिंग

पर्व त्योहारों या विशेष उत्सव पर यहाँ घर में पूजागृह एवं भित्ति चित्र का प्रचलन पुराना है। १७वीं शताब्दी के आस-पास आधुनिक मधुबनी कला शैली का विकास माना जाता है। मधुबनी शैली मुख्‍य रूप से जितवारपुर (ब्राह्मण बहुल) और रतनी (कायस्‍थ बहुल) गाँव में सर्वप्रथम एक व्‍यवसाय के रूप में विकसित हुआ था। यहाँ विकसित हुए पेंटिंग को इस जगह के नाम पर ही मधुबनी शैली का पेंटिग कहा जाता है। इस पेंटिग में पौधों की पत्तियों, फलों तथा फूलों से रंग निकालकर कपड़े या कागज के कैनवस पर भरा जाता है।

मधुबनी पेंटिंग शैली की मुख्‍य खासियत इसके निर्माण में महिला कलाकारों की मुख्‍य भूमिका है। इन लोक कलाकारों के द्वारा तैयार किया हुआ कोहबर, शिव-पार्वती विवाह, राम-जानकी स्वयंवर, कृष्ण लीला जैसे विषयों पर बनायी गयी पेंटिंग में मिथिला संस्‍कृति की पहचान छिपी है। पर्यटकों के लिए यहाँ की कला और संस्‍कृति खासकर पेंटिंग कौतुहल का मुख्‍य विषय रहता है। मैथिली कला का व्‍यावसायिक दोहन सही मायने में 1962 में शुरू हुआ जब एक कलाकार ने इन गाँवों का दौरा किया।

इस कलाकार ने यहां की महिला कलाकारों को अपनी पेंटिंग कागज पर उतारने के लिए प्रेरित किया। यह प्रयोग व्‍यावसायिक रूप से काफी कारगर साबित हुई। आज मधुबनी कला शैली में अनेकों उत्‍पाद बनाए जा रहे हैं जिनका बाजार फैलता ही जा रहा है। वर्तमान में इन पेंटिग्‍स का उपयोग बैग और परिधानों पर किया जा रहा है। इस कला की मांग न केवल भारत के घरेलू बाजार में बढ़ रही है वरन विदेशों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। अन्य उत्पादों में कार्ड, परिधान, बैग, दरी आदि शामिल है।

मधुबनी पर्यटन का दूसरा पहलू

मधुबनी अपने यहां आने वाले पर्यटकों पर जादुई असर करता है। जो पर्यटक यहां आते हैं, वे इस स्थान की खूबसूरती और विरासत से इंकार नहीं कर सकते हैं। कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है आपको एक बार मधुबनी घूमने जरूर जाना चाहिए। यहां का भगवती को समर्पित मंदिर और उग्रनाथ मंदिर पर्यटकों की पहली पसंद है। वर्तमान में यहां आने वाले पर्यटक बड़ी संख्या में इन मंदिर में पहुंचते हैं।

 

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